बच्चों में आत्मविश्वास कैसे जगाएं

माता-पिता बच्चों को किस तरह से आत्मबल दे सकते हैं

'मन के हारे हार, मन के जीते जीत।' यह वाक्य हम कठिन परिस्थितियों में इस्तेमाल करते हैं , क्योकिं उस समय व्यक्ति का आत्मविष्वास डगमगा जाता है। परन्तु दैनिक जीवन के छोटे कार्यों को भी पूर्ण करने क लिए व्यक्ति में आत्मविष्वास होना ज़रूरी है। मनोवैज्ञानिक एरिक एरिक्सन ने, किस तरह मनुष्य अपने जीवनकाल में अपनी पहचान बनाता है उस विषय पर अन्वेषण किया था।

उस अन्वेषण के परिणाम के अनुसार, मनुष्य जीवन में ८ विकास के चरणों से गुज़रता हे। हर चरण पर वह एक उलझन का सामना करता है।

१-३ साल की आयु में वह या तो स्वायत्तता(autonomy) की ओर बढ़ता या तो शर्म/संदेह के दलदल में फंस जाता है। इसी तरह ३-५ साल की आयु में बालक या तो आत्मबल (initiative) महसूस करता है या तो वह अपराधबोध (guilt) के तले दब जाता है।

मनुष्य आत्मबल तभी महसूस करता है जब वह आत्मविष्वासी हो। जब मनुष्य स्वयं से खुश होता है, तो वह अपने आप में सम्पूर्णता महसूस करता है। उसे अपनी क्षमताओं पर विश्वास होता है।

आत्मविष्वास हो तो मनुष्य क्या कुछ नहीं कर सकता, भले ही दुनिया का सबसे ऊँचा पहाड़ ही क्यों न चढ़ना हो। मगर आत्मविष्वास ना हो तो स्वयं के लिए क्या पहनना है उसका भी निर्णय करना बहुत मुश्किल लगने लगता है।

बच्चों में आत्मविष्वास बनाए रखना बहुत कठिन है।

बच्चे छोटी-छोटी बातों से बहुत ज़्यादा प्रभावित हो जाते हैं। स्वयं से अपना नाम सही से लिखना हो या कक्षा के समक्ष कविता प्रस्तुत करनी हो, यह सब छोटी-छोटी बातों से भी उन पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ाने और बनाए रखने में माता-पिता का बहुत ही महत्वूर्ण भूमिका होती है। कई बार माता-पिता अपने संघर्ष के सामने बालक के संघर्ष को छोटा समज लेते हैं। 'तुमने अभी दुनिया देखि ही कहाँ है?', यह शब्द तो हर बच्चे ने सुने ही होंगे। माता-पिता अपने बच्चों से बहुत उम्मीदें रखते हैं। उम्मीदें रखना गलत नहीं परन्तु अवास्तविक उमीदें बच्चे का आत्मविष्वास छीन लेती हैं , और उस पर एक अनावश्यक दबाव बना देती है।

माता-पिता कुछ छोटी तरकीबें लगा कर अपने बच्चे का आत्मविष्वास बनाए रख सकते हैं और बढ़ा भी सकते हैं। सबसे ज़्यादा आवश्यक है, अपने बच्चों के साथ समय व्यतीति करना। आजकल दोनों माता और पिता नौकरी और काम के चक्कर में, पारिवारिक समय को नज़रअन्दाज़ कर देते हैं। बच्चा अपने मन की बात अपने माता-पिता तक पहुंचा ही नहीं पता है। दिन के अंत में १५ मिनट अपने बच्चे से साथ बैठें और उससे जानें के उसका दिन कैसा था, क्या अच्छा हुआ, क्या बुरा हुआ, और अच्छे कार्यों के लिए सच्चाई से तारीफ करें।

बच्चे काफी सारी गलतियां करते हैं। इस डर से के बच्चा भविष्य में वही गलती न दोहराए, हम उसे डांट कर सुधारने की कोशिश करते हैं।डांटने का प्रभाव बच्चे पर सदा ही नकारात्मक होता है। डांटने की जगह प्यार से बात करके यह समझें के बच्चा है, गलती तो करेगा ही, और उसे सहारा दें, के गलतियों से ही हम सीखते हैं, तो वह हर परिस्थिति का आसानी से सामना कर सकता है।

हमारा अनुभव बच्चों की समझ के सामने काफी व्यापक होता है, परन्तु बच्चे की आयु के संबंध में, उसकी समज ज़्यादातर पर्याप्त होती है। बच्चो को बड़ी आसानी से 'नासमज' कह दिया जाता है, ऐसे शब्दों का बच्चे के मन पर नकारात्मक असर होता है। बच्चों को उनकी समझ से निर्णय लेने देना बहुत ज़रूरी है। यह तरीका ना ही बच्चे को सोचने पर मजबूर करेगा, बल्कि उसे अपने फैसले के लिए जवाबदार भी बनाएगा। बच्चे को स्वयं की समझ और क्षमता पर न्यास होगा।

बच्चे बड़ों का अनुमोदन (approval) प्राप्त करने के लिए तत्पर होते हैं। उन्हें स्वयं पर नाज़ होता है, जब उनके बड़े उन्हें कोई कार्य सौपतें हैं। बच्चों को उनकी आयु के हिसाब से कार्य सौंपे जा सकते हैं। जैसे १०-१२ साल के बच्चों को बहुत आनंद आता है, जब उन्हें किराने की दूकान से सामान लाने को कहा जाए। १५-१६ साल के बच्चे स्वयं को ज़िम्मेदार समझते हैं, और उनके भरोसे घर छोड़कर बड़े लोग कुछ देर के लिए घूमने चले जाएँ।

हर बच्चा अलग होता है। किसी का तारीफ सुन कर आत्मविष्वास बढ़ता है, तो किसी का ज़िम्मेदारियाँ उठा कर। माता-पिता अपने बच्चों के साथ समय बिताकर, उन्हें समझ कर, उनका आत्मा-विश्वास बढ़ाने में बड़ा योगदान निभा सकते हैं।

Article by: अदिती नीमा

लेखक


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Renuka Neema
मुझे गर्व है अपनी बेटी पर।

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