लिसनिंग की कला

IMPORTANCE OF LISTENING IN HINDI

विपाशा नायक

मेन्टल हेल्थ एम्बेसडर

“हमारे पास दो कान और एक मुंह है ताकि हम जितना बोलते हैं उससे दोगुना सुन सकें

अंतर्राष्ट्रीय श्रवण संघ (रेंकिन, 1930) द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक एक व्यक्ति अपने संचार समय में से लगभग 42%, सुनने में , 32% समय बोलने में, 11% लिखने में और 15% पढ़ने में व्यतीत करता है। अजीब बात है, हमें स्कूलों में पढ़ना, लिखना और बोलना सिखाया जाता है, लेकिन सुनना नहीं। हम अक्सर लिसनिंग शब्द का उपयोग हियरिंग के पर्याय के रूप में करते हैं। लेकिन क्या उनका मतलब एक ही है?

हियरिंग एक अनैच्छिक गतिविधि है और उसमें हमारे किसी अतिरिक्त प्रयास की आवश्यकता नहीं होती है। हिअर करने के लिए व्यक्ति को केवल कानों की ज़रुरत होती है। कान में कंपन का पता लगाने से ध्वनि को महसूस करने की क्षमता को हियरिंग कहते हैं । यह एक शारीरिक प्रक्रिया है। दूसरी ओर, लिसनिंग

एक स्वैच्छिक गतिविधि है और व्यक्ति को अपना पूरा ध्यान देना पड़ता है। लिसनिंग के समय व्यक्ति को न केवल कानों की बल्कि दिमाग और दिल की भी जरूरत होती है। लिसनिंग, बोले हुए और / या गैर-मौखिक संदेशों को प्राप्त करने, उनका अर्थ निकालने और उस पर प्रतिक्रिया देने की प्रक्रिया है। यह एक गहरी मानसिक और भावनात्मक प्रक्रिया है, न कि केवल भौतिक। इसके अलावा, लिसनिंग का मतलब सिर्फ किसी व्यक्ति के शब्दों पर ध्यान देना नहीं हैं। सही तरीके से सुनने का अर्थ है शब्दों, टोन और सबसे महत्वपूर्ण रूप से ,बॉडी लैंग्वेज पर ध्यान देना। हैरानी की बात यह

है की हम शब्दों से 10%, टोन द्वारा 30% और बॉडी लैंग्वेज द्वारा 60% सुनते हैं।

सही तरह से सुनना वास्तव में एक कौशल है और हम में से अधिकांश इसमें इतने अच्छे नहीं हैं। तो हम कैसे तय करें कि क्या हम ठीक से सुनना जानते हैं? आइए अपने आप से एक प्रश्न पूछें: 'क्या मैं वास्तव में अपने सभी रिश्तों से संतुष्ट हूं? फिर वह व्यक्तिगत हो या पेशेवर।' यदि हम ईमानदारी से इस प्रश्न का उत्तर देंगे, तो हमें पिछले प्रश्न का उत्तर भी मिल जायेगा। यदि आप एक माता/पिता

हैं, तो आपको शिकायत हो सकती है कि आपका बच्चा आपकी बात नहीं मानता। लेकिन अगर आप एक घडी रुक कर सोचें, तो क्या यह संभव नहीं है कि आपके बच्चे को आपके बारे में भी यही शिकायत हो? माता-पिता और बच्चे, बॉस और कर्मचारी, पति और पत्नी, और ऐसे कई रिश्तो की आम तौर पर यही समस्या है, एक-दूसरे को सही तरीके से न सुनने की। और यह समस्या संघर्ष और टकराव का कारण बन जाती है। किसी भी रिश्ते को बनाए रखने के लिए, लोगों के बीच एक बुनियादी समझ होनी चाहिए। अगर हम किसी व्यक्ति को ठीक से सुन नहीं सकेंगे तो हम उनहे सही मायनों में समझेंगे कैसे ?

हम सब सुनते समय कुछ सामान्य गलतियां करते हैं। अक्सर, हम पूरी बात को सुने बिना क्या सही है और क्या गलत है, इस निष्कर्ष पर पोहोंच जाते हैं। हम ज़रुरत ना होने पर भी अपने विचार रखना शुरू कर देते हैं। हम अपने सुझाव और सलाह देने लगते हैं जो हमारी अपनी समझ और अनुभवों के आधार पर होता है। कभी कभी हम चालु बातचीत के वक़्त अपने दिमाग में धारणायें बनाना शुरू कर देते हैं और कभी किसी से बात करते समय हमारा ध्यान कहीं और होता है। ये गलतियाँ संचार में बाधा डालती हैं बोलने वाले व्यक्ति को संतोष नहीं देती।

अगर हम सही तरीके से सुनना सिख जायें तो हम अपने बिगड़े रिश्तो को सुधार सकते है । लिसनिंग सार्थक संबंधों के लिए आधार बनाता है। हम सभी को वास्तव में किसी को सुनने के लिए ध्यान, और समानुभूति की आवश्यकता है। किसी को हमारे अविभाजित ध्यान देने से चमत्कार हो सकता है। यह वक्ता को एहसास दिला सकता है कि हम वास्तव में उनकी कदर करते करते हैं। समानुभूति होने का अर्थ है सामने वाले व्यक्ति की जगह पर खुद को रख पाना। किसी भी भावनाओं को समझने के लिए समानुभूति होना अनिवार्य है। अगर हम किसी को पूरे ध्यान और समानुभूति के साथ सुनते हैं, तो उन्हें लगता है कि उनकी देखभाल की जा रही है और वे हम पर भरोसा कर सकते हैं। और इससे रिश्ता मजबूत होता है।

अगली बार जब हमें किसी के साथ गलतफहमी या झगड़ा हो, तो शांति से बैठकर और पूरे ध्यान और समानुभूति से एक-दूसरे को सुनें।

यहां आपको बेहतर सुनने में मदद करने के लिए कुछ सुझाव दिए गए हैं:

• अपने फोन या किसी और चीज़ का उपयोग न करें जो बातचीत करते समय आपको विचलित करे

• बातचीत के दौरान आंखों का संपर्क बनाए रखें

• हो सके तो शांत और शोर-शराबे वाली जगह पर बात करना पसंद करें

• बात करते समय ध्यान बनाये रखने की कोशिश करें और व्यक्ति की बॉडी लैंग्वेज का निरीक्षण करें

• ज़रुरत पड़ने पर वक्ता से आवश्यक प्रश्न पूछें ताकि, उस बारे में अधिक स्पष्टता प्राप्त हो सके। यह वक्ता को भी आश्वस्त करेगा कि आप वास्तव में जानने के लिए उत्सुक हैं।

• बातचीत से जो कुछ समझ आया, उसे शब्दों और भावनाओं के साथ वापस प्रतिबिंबित करें या पुष्टि करें। उदाहरण के लिए, यदि कोई आपसे कहता है, "मैं उस घटना के बाद पार्टी में नहीं जाना चाहता।" आप यह कहते हुए इसकी पुष्टि कर सकते हैं कि "मैं समझता हूँ कि आप इस बात से शर्मिंदा हैं और आप आना नहीं चाहते।" यहां, शर्मिंदगी का एहसास है।

• स्पीकर से पूछें कि क्या वह आपसे सुझाव, सलाह या प्रतिक्रिया लेना चाहता है। यदि वह मांंगे तो ही दें।

सुनना वास्तव में सभी रिश्तों में विश्वास और समझ बनाने की कुंजी है। व्यक्तिगत और पेशेवर। ज़रुरत है तो बस हमारे ध्यान और समानुभूति की !

View more content by विपाशा नायक

Discussion Board

इसे पढ़ने के बाद आप "सुनने" के महत्व के बारे में क्या सोचते हैं?